मंगलवार, 5 अप्रैल 2011
रविवार, 30 जनवरी 2011
बुराईयाँ और सृज्जनता
अगर आप अपने दिल और दिमाग के थोड़े से भी हिस्से को बुराईयोँ से रिक्त कर देगेँ
तो वह रिक्त स्थान अपने आप सृज्जनता से भर जायेगा ।
मंगलवार, 18 जनवरी 2011
स्वंय और ईश्वर मेँ विश्वास
आप ईश्वर मेँ तब तक विश्वास नहीँ कर सकेगेँ ;
जब तक कि आप अपने आप मेँ विश्वास नहीँ करेगेँ ;
शनिवार, 15 जनवरी 2011
सुधार करना और चाहत
प्रत्येक व्यक्ति पूरी दुनिया को सुधारना चाहता है ;
परन्तु प्रत्येक व्यक्ति स्वंय मेँ कोई सुधार करना नहीँ चाहता है ;
शनिवार, 8 जनवरी 2011
सफलता और सकारात्मकता
एक व्यक्ति को सफल होने के लिए अति आवश्यक है कि उसमेँ सफलता की आस ;
असफलता के डर से कहीँ अधिक हो ;
बुधवार, 5 जनवरी 2011
प्रश्न पूछना और मूर्खता
जो व्यक्ति प्रश्न पूछता है वह कुछ क्षण मात्र के लिए मूर्ख बनता है ;
परन्तु जो व्यक्ति प्रश्न पूछता ही नहीँ वह जीवन भर मूर्ख बना रहता है ;
मंगलवार, 21 दिसंबर 2010
बहुत सरल है हमारा जीवन ~ भाग दो
भाग एक - से अब आगे पढ़ेँ
पिछले लेख मेँ तो हुई शरीर की बात , लेकिन हम शरीर को नहीँ , जीवन जीते हैँ। उसका अर्थ ही इसलिए है क्योँकि शरीर के माध्यम से हम जीवन को जीते हैँ। इसका मतलब यह हुआ कि शरीर जीवन को सार्थकता प्रदान करने वाला एक माध्यम है ।
जैसे ही हमारा यह शरीर समाज का सदस्य बनता है , वैसे ही जीवन की शुरूआत हो जाती है । जैसे ही हम अपने इस शरीर को समाज का हिस्सा बना देते हैँ , वैसे ही हम समाज के सारे तत्वोँ और मूल्योँ को आत्मसात करने के लिए बाध्य हो जाते हैँ। यह एक प्रकार से अपने ही हाथोँ से अपने ही ऊपर मछली पकड़ने का जाल डाल लेने जैसा है । यह जाल है - मान्यताओँ का , परंपराओँ का , धर्म का , रीति- रिवाजोँ का , सभ्यताओँ का , संस्कृतियोँ का , संस्कारोँ का , कानूनोँ का तथा और भी ना जाने किन - किन का ।
शरीर एक । जीवन भी एक । लेकिन लादे गए ये बोझ अनेक । यहीँ से शुरू हो जाती हैं - जीवन की विडंबनाएँ । दुनियाँ भर के चकल्लस , तनाव , आपाधापी तथा और भी न जाने क्या - क्या ।
क्या कोई उपाय है कि हम अपने इस शरीर की मासूमियत को बचाए रख सकेँ , कयोँकि इसी मासूमियत मेँ रहता है आनन्द का रस ।
पिछले लेख मेँ तो हुई शरीर की बात , लेकिन हम शरीर को नहीँ , जीवन जीते हैँ। उसका अर्थ ही इसलिए है क्योँकि शरीर के माध्यम से हम जीवन को जीते हैँ। इसका मतलब यह हुआ कि शरीर जीवन को सार्थकता प्रदान करने वाला एक माध्यम है ।
जैसे ही हमारा यह शरीर समाज का सदस्य बनता है , वैसे ही जीवन की शुरूआत हो जाती है । जैसे ही हम अपने इस शरीर को समाज का हिस्सा बना देते हैँ , वैसे ही हम समाज के सारे तत्वोँ और मूल्योँ को आत्मसात करने के लिए बाध्य हो जाते हैँ। यह एक प्रकार से अपने ही हाथोँ से अपने ही ऊपर मछली पकड़ने का जाल डाल लेने जैसा है । यह जाल है - मान्यताओँ का , परंपराओँ का , धर्म का , रीति- रिवाजोँ का , सभ्यताओँ का , संस्कृतियोँ का , संस्कारोँ का , कानूनोँ का तथा और भी ना जाने किन - किन का ।
शरीर एक । जीवन भी एक । लेकिन लादे गए ये बोझ अनेक । यहीँ से शुरू हो जाती हैं - जीवन की विडंबनाएँ । दुनियाँ भर के चकल्लस , तनाव , आपाधापी तथा और भी न जाने क्या - क्या ।
क्या कोई उपाय है कि हम अपने इस शरीर की मासूमियत को बचाए रख सकेँ , कयोँकि इसी मासूमियत मेँ रहता है आनन्द का रस ।
बुधवार, 15 दिसंबर 2010
बहुत सरल है हमारा जीवन ~ भाग एक
कितना सरल है हमारा जीवन , कितना सहज है इस जीवन का सारा गणित कि सब कुछ अपने आप ही होता चला जाता है ।
सांसोँ का आना- जाना , पलकोँ का गिरना - उठना और शरीर की हर उस क्रिया का होना , जो हमारे अस्तित्व की रक्षा के लिए अनिवार्य है । सब कुछ आँटोमैटिक । यहाँ तक कि हमारे शरीर ने भी अपनी क्षमताएं अपनी जरूरत के अनुसार विकसित कर ली हैँ।
उसने आंखोँ को एक कोटर मेँ सुरक्षित रखा है ताकि चोट लगने पर यह फूटे नहीँ । यदि नाक और कान को शरीर के बाहरी हिस्से मेँ रखा , तो उसे लोचदार बना दिया ताकि आसानी से टूट ना जाए । मस्तिष्क , जो जीवन का आधार है उसे कपाल जैसे कठोर आवरण मेँ ढंककर रखा । सचमुच कितनी अद्भुत निर्मिति है - हमारा यह शरीर इस प्रकृति की । बेहद जटिल किँतु स्वचालित ।
[शेष अगले भाग मेँ]
सांसोँ का आना- जाना , पलकोँ का गिरना - उठना और शरीर की हर उस क्रिया का होना , जो हमारे अस्तित्व की रक्षा के लिए अनिवार्य है । सब कुछ आँटोमैटिक । यहाँ तक कि हमारे शरीर ने भी अपनी क्षमताएं अपनी जरूरत के अनुसार विकसित कर ली हैँ।
उसने आंखोँ को एक कोटर मेँ सुरक्षित रखा है ताकि चोट लगने पर यह फूटे नहीँ । यदि नाक और कान को शरीर के बाहरी हिस्से मेँ रखा , तो उसे लोचदार बना दिया ताकि आसानी से टूट ना जाए । मस्तिष्क , जो जीवन का आधार है उसे कपाल जैसे कठोर आवरण मेँ ढंककर रखा । सचमुच कितनी अद्भुत निर्मिति है - हमारा यह शरीर इस प्रकृति की । बेहद जटिल किँतु स्वचालित ।
[शेष अगले भाग मेँ]
सोमवार, 6 दिसंबर 2010
प्रकृति और मानव मन-मस्तिष्क की क्षमता
प्रकृति और मानव मन- मस्तिष्क मेँ अनूठी क्षमता होती हैँ । यदि मनुष्य बुद्धि - विवेक से काम लेँ , उचित - अनुचित का विचार कर प्रकृति का उपयोग करेँ , तो वह सदैव वरदान के रूप मेँ कल्याणकारी होती है ।
सदगुण- दुर्गुण प्रत्येक व्यक्ति की अंतःचेतना मेँ विधमान रहते हैँ । मिट्टी मेँ उर्वरा शक्ति होती है । उसमेँ जैसा बीज बोया जाता है , वैसा ही फल आता है । ईश्वर और प्रकृति ने मनुष्य को जो शक्तियाँ प्रदान की हैँ , यदि उनका सदुपयोग किया जाए , तो असीमित सुख - समृद्धि से संपन्न बना जा सकता है ।
पृथ्वी की भाँति मनुष्य की कर्मभूमि भी उर्वरा है । यदि उसे सदाचारोँ से जोतेँ , उत्तम विचारोँ से सीँचेँ और सत्कार्योँ के बीज बोएं , तो पुण्य और कीर्ति की फसल लहलहाएगी । इसी तरह यदि मस्तिष्क की उर्वरता का भी हम ठीक से उपयोग करेँ , श्रेष्ठ चिंतन के बीज बोएं , बुद्धि से सीँचेँ , विवेक का उर्वरक डालेँ , तो नवनिर्माण की हरियाली जन्म लेगी ।
हमारे भीतर अन्नपूर्णा जैसी शक्ति है , जो हमारी आकांक्षाओँ को शांत कर सफलता प्रदान कर सकती है । प्रकृति का कार्य हमेँ साधनोँ से संपन्न करना है । उनके उपयोग की कला , सही- गलत के उपयोग का निर्णय करने के लिए उसने हमेँ बुद्धि एवं विवेक नामक दो दुर्लभ विभूतियां प्रदान की हैँ । व्यक्ति अपनी क्षमता और साधनोँ का समुचित उपयोग कर जीवन को श्रेष्ठ कार्योँ से कृतार्थ कर सकता है।
प्राकृतिक साधनोँ और मन- मस्तिष्क का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए , तो वह वरदान सिद्ध होता है , लेकिन दुरूपयोग करने पर अभिशाप के रूप मेँ सामने आते हैँ ।
सदगुण- दुर्गुण प्रत्येक व्यक्ति की अंतःचेतना मेँ विधमान रहते हैँ । मिट्टी मेँ उर्वरा शक्ति होती है । उसमेँ जैसा बीज बोया जाता है , वैसा ही फल आता है । ईश्वर और प्रकृति ने मनुष्य को जो शक्तियाँ प्रदान की हैँ , यदि उनका सदुपयोग किया जाए , तो असीमित सुख - समृद्धि से संपन्न बना जा सकता है ।
पृथ्वी की भाँति मनुष्य की कर्मभूमि भी उर्वरा है । यदि उसे सदाचारोँ से जोतेँ , उत्तम विचारोँ से सीँचेँ और सत्कार्योँ के बीज बोएं , तो पुण्य और कीर्ति की फसल लहलहाएगी । इसी तरह यदि मस्तिष्क की उर्वरता का भी हम ठीक से उपयोग करेँ , श्रेष्ठ चिंतन के बीज बोएं , बुद्धि से सीँचेँ , विवेक का उर्वरक डालेँ , तो नवनिर्माण की हरियाली जन्म लेगी ।
हमारे भीतर अन्नपूर्णा जैसी शक्ति है , जो हमारी आकांक्षाओँ को शांत कर सफलता प्रदान कर सकती है । प्रकृति का कार्य हमेँ साधनोँ से संपन्न करना है । उनके उपयोग की कला , सही- गलत के उपयोग का निर्णय करने के लिए उसने हमेँ बुद्धि एवं विवेक नामक दो दुर्लभ विभूतियां प्रदान की हैँ । व्यक्ति अपनी क्षमता और साधनोँ का समुचित उपयोग कर जीवन को श्रेष्ठ कार्योँ से कृतार्थ कर सकता है।
प्राकृतिक साधनोँ और मन- मस्तिष्क का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए , तो वह वरदान सिद्ध होता है , लेकिन दुरूपयोग करने पर अभिशाप के रूप मेँ सामने आते हैँ ।
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
सफलता और नैतिकता
प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह
याद रखना बेहतर होगा कि
सभी सफल व्यवसाय नैतिकता की नीँव पर आधारित होते हैँ ।
समस्त सफलताएँ कर्म की नीँव पर आधारित होती है ।
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